शनिवार, १९ मार्च, २०१६

कितनी गिरहें खोली है मैने ,
कितनी गिरहें अब बाकी है ,
       पाव मै पायल ,
       बाहो मै कंगन ,
      गले मै हसली ....
     कमरबंद ,छल्ले  और बिछुवे .....
नाक कान छिदवाये गये और  जेवर जेवर केहते केहते ....
रिती रिवाज कि रस्सियो से  मै जकडी गयी...उफ़्फ़  कितनी तरहा मै पकडी गयी
               अब छिलने लगे  है  हाथ पाव
                 और कितनी खराशे उभरी है ...
  कितनी गिरहें खोली है मैने
  और कितनी रस्सिया उतरी है ...
                 अंग अंग ....मेरा रूप रंग
                मेरे नक्श नैन ..मेरे बोल बैन..,
मेरी आवाज मै कोयल कि तारीफ हुई
मेरी जुल्फ रात ..मेरी जुल्फ सांप..
जुल्फो मै घटा ...
         मेरे लाब गुलाब ..आंखे शराब
          गजले और नज्मे  कहते कहते ..
मै हुसन और इशक़  कि अफ्सानो मै जकडी गयी...
उफ़्फ़ कितनी तऱ्हा मै पकडी गयी ..
मै पुछू जरा .....
आंखो मै शराब दिखी सबको ....आकाश नाही दिखा कोई ..?
सावन भादो तो दिखे मगर ..क्या दर्द नही दिखा कोई ..?
फन कि झिनी सी चादर मै , बुत छिले गये उरयानी के ...
तागा तागा करके पोशाक उतारी गयी ...
मेरे जिस्म पर फन कि मशक हुई
और आर्ट -कला  केहते केहते .. संगमरमर मे मै  जकडी गई ..
उफ़्फ़ कितनी तऱ्हा मै पकडी गई....!
बदला ना कोई ना कोई बदलाव बाकी है
कितनी गिरहें खोली है मैने ,
कितनी गिरहें अब बाकी है ...!!!

गुलजार